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बुधवार, 7 नवंबर 2012

शीघ्र भेजा जाएगा ‘गुफ्तगू ग़ज़ल व्याकरण विशेषांक’


शीघ्र भेजा जाएगा ‘ग़ज़ल व्याकरण विशेषांक’
जिन लोगों ने ‘गुफ्तगू’ के ग़ज़ल व्याकरण विशेषांक के लिए अग्रिम धनराशि भेजकर प्रति सुरक्षित कराई है, उन्हें यह अंक पांच नवंबर को विमोचन के बाद पोस्ट किया जाएगा, तब तक धैर्य बनाए रखें। जिन लोगों ने अं
क सुरक्षित नहीं कराया है वे शीघ्र करा लें। ‘गुफ्तगू’ के आजीवन सदस्यों को यह अंक मुफ्त में प्रदान किया जाएगा। इस अतिरिक्तांक में आर.पी. शर्मा ‘महर्षि’ के बह्र विज्ञान और इल्मे का काफि़या की सभी सरीज के अलावा ग़ज़ल विधा पर उपेंद्र नाथ अश्क़, प्रो. अली अहमद फ़ातमी, मुनव्वर राना, एहतराम इस्लाम, डाॅ. परमानंद पांचाल, अशोक रावत, नक़्श इलाहाबादी, डाॅ. श्याम सखा श्याम, आचार्य आसी पुरनवी, सुनहरी लाल शुक्ल, रमेश प्रसून, इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी और वीनस केसरी के महत्वपूर्ण आलेख शामिल हैं। इन आलेखों में ग़ज़ल विधा की बाराकियां को आसान ढंग से समझाया गया है। यह अंक जहां नये लिखने वालों को अद्वितीय जानकारी देगा, वहीं वरिष्ठ रचनाकारों के लिए बेहद पठनीय होगा। 112 पेज वाले इस अतिरिक्तांक का मूल्य 50 रुपए है। 50 रुपए का मनीआर्डर भेजकर अपनी प्रति आज ही बुक करा लें। रजिस्टर्ड डाक अथवा कोरियर से मंगवाने के लिए 25 रुपए अतिरिक्त जोड़ें।

गुफ्तगू के ग़ज़ल व्याकरण अतिरिक्तांक में
3.संपादकीय- अतिरिक्तांक की ज़रूरत
4-11. नई इक़दार और नई उर्दू ग़ज़ल- प्रो. अली अहमद फ़ातमी
12-21.हिन्दी वाड्मय और ग़ज़ल-एहतराम इस्लाम
22-25.उर्दू शायरी पर हिन्दी का प्रभाव-उपेंद्र नाथ अश्क़
26-28.ग़ज
़ल सिर्फ़ महबूब से बात करने का नाम नहीं है-मुनव्वर राना
29-31.हिन्दी पाठ्यक्रम में शामिल हो ग़ज़ल-इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी
32-35.हिन्दी कविता के संदर्भ में आज की
ग़ज़ल-एहतराम इस्लाम
36.ग़ज़ल: कल से आज तक-नक़्श इलाहाबादी
37-39.ग़ज़ल की लोकप्रियता क्यों बढ़ी-अशोक रावत
40-42.उर्दू कविता के बाबा-ए-आदम वली दकनी- डा. परमानंद पांचांल
43-45.ग़ज़ल के रुक़्न या खंड- डा. श्याम सख़ा श्याम
46-57.ग़ज़ल की आरंभिक जानकारी-वीनस केसरी
58. ग़ज़ल में कितने शेर हों- आचार्य आसी पुरनवी
59-60.शब्द की मात्रा की गणना का ज्ञान- सुनहरी लाल शुक्ल
61-63.बह्र विज्ञान के बारे में- आर.पी शर्मा ‘महर्षि’
64-90.बह्र विज्ञान- आर.पी शर्मा ‘महर्षि’
91-95.उर्दू बह्रों का शेरो-शायरी में महत्व- आर.पी शर्मा ‘महर्षि’
96-98.ग़ज़लों के लिए उपयुक्त हिन्दी छंद- आर.पी शर्मा ‘महर्षि’
99-100.क़ाफि़या के बारे में- आर.पी शर्मा ‘महर्षि’
101-110.इल्मे क़ाफि़या- आर.पी शर्मा ‘महर्षि’
111.माहिया-रमेश प्रसून
112.जनक छंद-रमेश प्रसून

पत्राचार -
संपादक- गुफ्तगू
123ए-1, हरवारा, धूमनगंज, इलाहाबाद-211011
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शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

कैम्पस काव्य प्रतियोगिता एवं विमोचन समारोह दो अक्तूबर को





इलाहाबाद। ‘गूफ्तगू कैम्पस काव्य प्रतियोगिता’ एवं अब्बास खान संगदिल अंक का विमोचन आगामी दो अक्तूबर को गांधी जयंती के अवसर पर किया जाएगा। इलाहाबाद के प्रीतमनगर में स्थित मदर्स इंटरनेशनल पब्लिक स्कूल में दोपहर 12ः30 बजे कार्यक्रम का शुभारंभ होगा। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के पूर्व अध्यक्ष डा. सोम ठाकुर मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत करेंगे,अध्यक्षता वरिष्ठ शायर एहतराम इस्लाम करेंगे। कार्यक्रम का उद्घाटन इलाहाबाद शहर की मेयर श्रीमती अभिलाषा गुप्ता करेंगी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उर्दू विभाग के प्रो. अली अहमद फ़ातमी, विधायक पूजा पाल, वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्र, चंदौली के जिलाधिकारी पवन कुमार सिंह, उत्तर प्रदेश शासन में वित्त अधिकारी मनीष शुक्ल, चिट्स एंड फंड विभाग के मुख्य लेखाधिकारी जी.डी. गौतम, मंुडेरा मंडी परिषद के सचिव संजय कुमार सिंह, गनपत सहाय पीजी कालेज सुल्तानपुर में उर्दू की विभागध्यक्ष डा. ज़ेबा महमूद, उत्तर प्रदेश राज्य शैक्षणिक संस्थान की निदेशक भावना शिक्षार्थी, डा. पीयूष दीक्षित, डा. राजीव सिंह और मुंडेरा व्यापार मंडल के अध्यक्ष धनंजय सिंह, बालमित्र स्कूल के प्रबंधक सी.आर. यादव कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के तौर पर शिरकत करेंगे। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी करेंगे। कार्यक्रम का संयोजन शिवपूजन सिंह, नरेश कुमार ‘महरानी’, वीनस केसरी, सौरभ पांडेय, संजय सागर, फरमूद इलाहाबादी, शाहनवाज़ आलम आदि कर रहे हैं। कैम्पस काव्य प्रतियोगिता के अंतर्गत सभी शिक्षण संस्थानों में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं से प्रविष्टियां मांगी गई थीं। आयी हुई कुल प्रविष्टियों में से 15 लोगों का काव्यपाठ कार्यक्रम के दौरान कराया जाएगा। मौजूद अतिथि सभी को एक से दस के बीच अंक देंगे। सभी के अंकों को जोड़ने के बाद विजेता का निर्णय होगा। प्रथम पुरस्कार के रूप में 1500 रुपए नगद, द्वितीय पुरस्कार 1000 रुपए और तृतीय पुरस्कार के रूप में 751 रुपए दिए जाएंगे। इसके अलावा 10 प्रतिभागियों को सांत्वना पुरस्कार के रूप में 500-500 रुपए की साहित्यिक पुस्तकें दी जाएंगी।


सोमवार, 9 जुलाई 2012

गुफ्तगू के ‘लोगो' का विमोचन व मुशायरा संपन्न

शनिवार की शाम इलाहाबाद के करैली मुहल्ले में स्थित 'अदब घर' में गुफ़्तगू के 'लोगो' का विमोचन अमृत प्रभात के कार्यकारी संपादक मुनेश्वर मिश्र ने किया। इस दौरान नशिस्त का आयोजन किया गया| जिसमें कवियों-शायरों ने अपनी रचनाएं सुनाईं। रात ११ बजे तक लोगों ने शेरो-शायरी का आनंद लिया। अध्यक्षता वरिष्ठ शायर डा. इनआम हनफी ने किया| तथा संचालन का दायित्व इम्तियाज अहमद गाजी ने पूरा किया।



मुनेश्वर मिश्र ने इस अवसर पर गुफ़्तगू के साथ गुजरे समय को याद करते हुए कहा कि अनवरत प्रयास में लगे रहने पर देर-सवेर सफलता जरूरत मिलती है| यह बात गुफ्तगू टीम पर भी लागू हुई और आज परिणाम सबके सामने है। एक छोटे से प्रयास से शुरू हुई की गई इस पत्रिका में देश-विदेश में अपनी पहचान बना ली है, और यह अपने प्रकाशन के दस वर्ष पूरे करने जा रही है और आज इसका 'लोगो' तैयार कर उसका विमोचन कर दिया गया यह एक और कदम आगे बढ़ने की ओर संकेत दे रहा है। 


सलाह ग़ाज़ीपुरी-
बढ़ा नेफ़ाक़ जो सहने-चमन की वादी में,
खेज़ा के दौर में ख़ारों ने साथ छोड़ दिया।
मुझे तो गहरी नदी में ही डूब जाना था
क़रीब आकर किनारों ने साथ छोड़ दिया।


नरेश कुमार महरानी
हे प्रिये मिलो मिलने की चाह लिए
जहां जमीं आसमां मिलते हैं।

 विपिन श्रीवास्तव- 
तुम सुग्मित सतरंगी सी दामिनी आई
दंतावलि में जब आंचल कोर दबाती आई।
ओ तन्वगी तेरे तन आई तरूणाई
अंग-अंग आंखें खोले जब तू ले अंगड़ाई।



गुलरेज़ इलाहाबादी-
कोई कांधे पे लेकर चल रहा मां-बाप को अपने
कोई बोझा समझता है तो नेकी छूट जाती है।
रहे फूलों की संगत में तो कांटे भी महकते हैं
मरा से राम बनते ही डकैती छूट जाती है।


फरमूद इलाहाबादी-
पी के दारु अंग्रेजी चूहा झाड़ने लगा।
शेरे बब्बर की तर्ज पर दहाड़ने लगा।
जा के बिल्ली के पास बोला आई लव यू
बिल्लो रानी कहो तो अभी जान दे दूं


 इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी-
राह में पहले कांटे बिछा दो।
मील का हमको पत्थर दिखा दो।
कोई भी जंग मुश्किल न होगी
शर्त है खुद को ग़ाज़ी बना दो।


शाहिद इलाहाबादी-
बहुत लतीफ है एहसास पारसाई भी
न हो जो पास तो होती है जग हंसाई भी।
मसीहे वक़्त को ज़र की तलब ने लूट लिया
मलो अब हाथ गई दस्त से शिफाई भी।


वीनस केसरी-
जाल सैयाद फिर से बिछाने लगे।
क्या परिन्दे यहां आने-जाने लगे।
वो जो इस अड़े थे कि सच ही कहो
मैंने सच कह दिया तिलमिलाने लगे।


डाॅ. सूर्या बाली-
शहर ये हो गया श्मशान कहीं और चलें।
बस्तियां हो गयीं वीरान कहीं और चलें।
कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई इसाई यहां
है नहीं कोई भी इंसान कहीं और चलें।


फरहान बनारसी-
रहबरी जब हो किसी मद-ए-खुदा की, तो ये मंजिल बोले
मैं तो दुश्वार भी  तूने गर आसान किया है मुझको।


आसिफ ग़ाज़ीपुरी-
जी के देखो ये जिन्दगी क्या है।
हाथ कंगन को आरसी क्या है।
मंजिलें इश्क़ ढूढने वालों
यो ही भटका करो अभी क्या है।


अजय कुमार-
ईश्वर के चरण में  ना मिले मुझे
पर पिता आपका साया हो
मन में सेवा का भाव रहे
प्रभु ऐसा प्रेम समाया हो।


वाकिफ़ अंसारी-
ये समुन्दर भी कामयाब नहीं
एक तिनका जो ग़र्क-आब नहीं।
दिल को दिल से अगर मिला दिया जाये
इसे बढ़कर कोई सवाब नहीं।

खुर्शीद हसन-
कहता ये खुर्शीद हसन थे बडे़ मेहंदी हसन
ग़ज़लों के कह के अलविदा यूं चल बसे मेहंदी हसन।






नित्यानंद राय-
मचलो न तब तक तुम
बोतल में मय खुद न डोले
मयपान तुम्हें कराने को
खुद न अपना ढक्कन खोले।


डाॅ. नईम साहिल-
आ गया रास ज़माने को जब अंदाज़ मेरा
आइना भी हुनरे-शीशागरी मांगे है।
जान जाओगे तो हैरानी तुम्हें भी होगी
कौन किस-किस से यहां तश्नालबी मांगे है।




सद्रे मुहतरम डा. इनआम हनफी ने अपनी शायरी से छाप छोड़ी-
इसी उम्मीद पे चलते रहेंगे दीवाने
अंधेरी रात के दामन में एक सेवरा है।



अंत में वीनस केसरी ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।

सोमवार, 11 जून 2012

‘गुफ्तगू’ ने आयोजित की काव्य गोष्ठी


गुफ्तगूकी तत्वावधान में करैली, इलाहाबाद स्थित 'अदब घर' में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ शायर एहतराम इस्लाम द्वारा की गई, तथा मुख्य अतिथि तलब जौनपुरी थे। संचालन इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। इस अवसर पर गुफ्तगू के तकनीकी व्यवस्थापक वीनस केसरी के द्वारा घोषणा की गई की अब से हर महीने के दूसरे शनिवार को 'गुफ्तगू' की और से 'अदब घर' में काव्य गोष्ठी आयोजित की जाएगी, जिसका सभी शायरों तथा कवियों ने खुले दिल से स्वागत किया तथा गुफ्तगू के इस शुरुआत की सराहना की

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए नवोदित कवि अजय कुमार ने हरिवंश राय बच्चन की कृति मधुशाला को समर्पित कविता पढ़ी-

कृष्ण काल की सुरमय भीतर रखती मधुशाला
कर लेता आकर्षित सबको मुरली के जैसा प्याला।

मधुशाला है कृष्ण यहां पर, प्याला है मुरली जैसे,
राधा का किरदार निभाताा, इस युग में पीने वाला।
 



खुर्शीद हसन ने कहा-

गर्मी से बिलखता है हर एक बशर भाई,
राह में लगा देना तुम एक शजर भाई।

 


डाॅ. नईम साहिलने कहा-

बदल दी शक्लो-सूरत आंधियों ने,
मकां सारे पुराने लग रहे हैं।

हालात ऐसे होंगे ये सोचा न था कभी,
होगा मज़े में आइना पत्थर के साथ।

कवि सौरभ पांडेय ने अपनी कविताओं में गांव का चित्रण किया-

सरकारिया बयान सुधर गांव-गांव है
बरबादियों का दौर मगर गांव-गांव है।

जिन कुछ सवाल से सदा बचते रहे थे तुम
हर वो सवाल आज मुखर गांव-गांव है।

 



वीनस केसरी की ग़ज़ल ने सभी का प्रभावित किया-

एक रानी ने गढ़ा गुड्डे का इक किरदार है।
और गुड्डा भी तो बस चाभी भरो तैयार है।

बढ़ती महंगाई के मुद्दे पर बहस की आड़ में,
काले धन पर मौन हर इक पक्ष को स्वीकार है।


 अजीत शर्मा आकाशने अच्छी ग़ज़ल सुनाई-

एक तिनके का सहारा चाहता है,
और क्या गर्दिश का मारा चाहता है।

नोच खाएगा उसे जिसको कहोगे,
पालतू कुत्ता इशारा चाहता है।


संचालन कर रहे इम्तियाज़ अहमद ग़ाज़ी की ग़ज़ल काफी सराही गई-

रस्मे उल्फ़त अदा कीजिए,
आप मुझसे मिला कीजिए।

गर सलीक़ा नहीं इश्क़ का,
बस ग़ज़ल पढ़ लिया कीजिए।

प्यार करते हैं गर आप भी,
एसएमएस कर दिया कीजिए।




सलाह ग़ाज़ीपुरी ने कहा-

नुमाइश जिस तरह अब हो रही है सारी दुनिया में,
खुली सड़कों पे यह आवारगी देखी नहीं जाती।

मुझे वह मुफलिसी के दिन कभी जो याद आते हैं,
किसी घर की भी मुझसे मुफलिसी देखी नहीं जाती।


युवा कवि शैलेंद्र जय की कविताओं ने काफी प्रभावित किया-

त्योंरियां चढ़ाना भी फैशन हो गया।
कितना यांत्रिक मानव जीवन हो गया,

मुस्कुराता है नफा-नुकसान देखकर
आदमी भी आज एक विज्ञापन हो गया।



फरहार बनारसी ने ग़ज़ल पढ़ी-

दुश्मनों की बात क्या थी सारे अपनों ने मुझे
ज़ह्र का प्याला पिलाया, बात जब सच्ची कही।


फरमूद इलाहाबादी की ग़ज़ल को लोगों ने काफी पंसद किया-

किसी तरह नहीं ममता से कमतर बाप का साया,
सभी हाथों के साए से हैं बेहतर बाप का साया। आसिफ ग़ाज़ीपुरी ने कहा-

फूल खिलने भी न पाये थे के मौसम बदला,
लग गयी आग गुलिस्तां में बहारों के करीब

आपकी बज़्म से उठकर मैं चला आया था,
क्या सबब इसका था के आपने पूछा भी नहीं।

शाहिद इलाहाबाद ने कहा-

अब सोचता हूं ईंट का पत्थर से दूं जवाब,
लेकिन रसूले पाक को क्या मुंह दिखाउंगा।

शायर अख़्तर अज़ीज ने तरंन्नुम में ग़ज़ल सुनाकर खूब वाहवाही बटोरी-

छबी चिनगारियां कम कर रहे हैं।
कि हम शोलों को शबनम कर रहे हैं।

खुशी उस शख़्स को क्यों मिल रही है,
इसी इक बात का ग़म कर रहे हैं।


मुख्य अतिथि तलब जौनपुरी ने कहा-

माहौल का अजीब सा तेवर है आजकल।
गुमराहियों में मुब्तिला घर-घर है आजकल।

ज़ालिम ने मेरे सर पे ज़रा हाथ क्या रखा,
रुतबा मेरा जहान से उपर है आजकल।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे एहतराम इस्लाम की ग़ज़ल को खूब दाद मिली-
वार्ताएं, योजनाएं, घोषणाएं फैसले
इतने पत्थर और तन्हा आइना निष्कर्ष का।